
जिस न्यायालय के बाहर लगा साइन बोर्ड महीनों से टेढ़ा खड़ा है,
वह मानो खुद गवाही दे रहा हो—
कि अंदर सब कुछ सीधा नहीं है!
कई महीनों से यह साइन बोर्ड
खामोशी से पूछ रहा है—
*“क्या मुझे सीधा करने वाला कोई नहीं?”*
लेकिन अफ़सोस!
इसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं,
क्योंकि यहाँ तो न्याय नहीं, सौदेबाज़ी की आवाज़ें गूंज रही हैं।
यह वही न्यायालय है
जहाँ सही को गलत और गलत को सही साबित कर दिया जाता है,
जहाँ फैसलों का वजन तराजू से नहीं,
जेब की गहराई से तय होता है।
सवाल यह नहीं कि
साइन बोर्ड टेढ़ा क्यों है,
सवाल यह है कि
क्या न्याय भी उसी दिशा में झुक चुका है?जब बाहर का बोर्ड महीनों से नहीं सुधरता,तो अंदर की व्यवस्था कैसे सुधरेगी?
जब व्यवस्था पर बैठे लोग
जनता की नहीं,
अपनी जेब की सुन रहे हों—
तो इंसाफ़ किससे उम्मीद करे?
*यह रिपोर्ट चेतावनी है!*
व्यवस्था से, प्रशासन से और उन सभी से जो न्याय के मंदिर को
स्वार्थ का बाजार बना चुके हैं।
अब सवाल जनता पूछ रही है—
क्या इस न्यायालय में कभी सच सीधा खड़ा होगा,या यूँ ही सब कुछ टेढ़ा चलता रहेगा?




