छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में इन दिनों क्या चल रहा है? सवाल बड़ा है, और इससे भी बड़ा है वह सच, जो तस्वीरों में कैद है—लेकिन अधिकारियों की फाइलों में कहीं खो जाता है।

एमसीबी जिले का बोडेमुड़ा शासकीय माध्यमिक विद्यालय—

यहां छात्राओं के साथ प्राचार्य के अभद्र व्यवहार की शिकायतें सामने आती हैं।
छात्राएँ डरते-डरते अपनी बात बताती हैं, गांव वाले चिंता जताते हैं, लेकिन जैसे ही मामला ऊपर जाता है, खंड शिक्षाधिकारी पूरे मामले को “झूठा” बताकर खारिज कर देते हैं।
क्या बच्चों की आवाज इतनी भी कमजोर हो गई है कि एक हस्ताक्षर से कुचल दी जाए?
चिरमिरी के चित्ताझोर पीएम श्री स्कूल का मामला—

यहाँ तस्वीरें साफ दिखाती हैं कि नन्हें बच्चे फावड़े थामें स्कूल परिसर की सफाई कर रहे हैं।
लेकिन स्कूल के हेडमास्टर का दावा है—
> “ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं।”

तस्वीरें झूठ बोल रही हैं या बयान?
तीसरा मामला — स्कूल में बच्चे अपने साथ गोबर तक लाते हुए दिखे।

वीडियो मौजूद है, तस्वीरें मौजूद हैं, बच्चे मौजूद हैं।
पर स्कूल की प्रधान पाठिका का बयान—
> “ऐसा कुछ नहीं हुआ।”
और खंड शिक्षाधिकारी की जांच भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई।
जांच नहीं, बल्कि जांच का नाटक हुआ—और निष्कर्ष वही:
“मामला गलत है।”

अब बड़ा सवाल यही है—
जब आँखों से दिखाई देने वाला सच भी गलत घोषित कर दिया जाता है, तब इस व्यवस्था में सही क्या बचता है?
एक तरफ तस्वीरें, वीडियो, साक्ष्य—
दूसरी तरफ कागजों पर लिखी सफाई, विभागीय संरक्षण और “सब ठीक है” का राग।
तो क्या यहाँ सच दबाया जा रहा है?
क्या बच्चों की आवाज़ सुनने की जगह सिस्टम उनकी बात को ही झूठा साबित करने में लगा है?
क्या सरकारी स्कूलों में अनुशासन की रखवाली करने वाले ही आज सवालों के घेरे में नहीं हैं?
छत्तीसगढ़ के इन स्कूलों से निकलते सवाल सिर्फ स्कूलों के नहीं—
यह पूरे शिक्षा तंत्र पर चोट हैं।
जब बच्चों के अधिकारों, उनकी सुरक्षा और उनके भविष्य को ही अनदेखा किया जाने लगे,
तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि प्रणाली की विफलता कहलाती है।
अब वक्त है कि जिम्मेदार अधिकारी तस्वीरों को “गलत” बताने के बजाय
तस्वीरों में दिख रहे सच को देखने की हिम्मत दिखाएँ।
क्योंकि कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता—
झूठ तो अक्सर बयान बोलते हैं।
(यह विशेष रिपोर्ट स्थानीय स्थिति, जनभावना और उपलब्ध साक्ष्यों के विश्लेषण पर आधारित है।)




