छत्तीसगढ़

कटहलपारा में आबकारी का खेल? छापेमारी के बाद रिश्वत लेकर मामला दबाने के आरोप, विभाग की भूमिका पर उठे बड़े सवाल

चिरमिरी। अवैध कच्ची शराब के खिलाफ कार्रवाई करने वाला आबकारी विभाग खुद सवालों के घेरे में आ गया है। पोड़ी क्षेत्र के कटहलपारा में हुई हालिया छापेमारी के बाद स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों ने दो घरों में कार्रवाई के दौरान कथित रूप से रकम लेकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
आरोप है कि एक घर से करीब 18 हजार रुपए और दूसरे घर से 15 हजार रुपए लेकर कार्रवाई को प्रभावहीन बना दिया गया। हालांकि इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि इनमें सच्चाई है तो यह पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

*जब आबकारी सो जाए, तब पुलिस संभाले मोर्चा?*

एक ओर आबकारी विभाग पर कार्रवाई के नाम पर समझौते के आरोप लग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चिरमिरी पुलिस लगातार शिकायतों के आधार पर अवैध कच्ची शराब बनाने और बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई करती नजर आ रही है। पुलिस द्वारा समय-समय पर की गई कार्रवाई से यह साफ होता है कि क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार अभी भी जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अवैध शराब पर रोक लगाने के लिए सरकार ने अलग से आबकारी विभाग बना रखा है, तो फिर पुलिस को बार-बार इस जिम्मेदारी का निर्वहन क्यों करना पड़ रहा है?

*कार्रवाई या वसूली?*

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि छापेमारी के दौरान वास्तव में लेन-देन कर मामला दबाया गया है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि कानून व्यवस्था के साथ खुला खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में कार्रवाई करने के बजाय समझौता होने लगे तो अवैध कारोबारियों के हौसले और बुलंद होंगे।

*जांच की मांग तेज*

कटहलपारा में उठे इस विवाद के बाद लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि छापेमारी में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सही साबित होते हैं तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

*जनता पूछ रही है…*

*क्या आबकारी विभाग अवैध शराब पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है या फिर केवल वसूली करने के लिए?*

जब कार्रवाई के बाद भी अवैध कारोबार बंद नहीं हो रहा और पुलिस को बार-बार मैदान में उतरना पड़ रहा है, तो आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन आरोपों को गंभीरता से लेकर सच्चाई सामने लाता है या फिर मामला फाइलों में दबकर रह जाता है।

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